पिछ्ले दिनों तिरुपति जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। बहुत दिनों से इच्छा थी।

पिछ्ले दिनों तिरुपति जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। बहुत दिनों से इच्छा थी, किसी ने जरा सा न्यौता क्या दिया, मैंने झट से मौका झपट लिया।

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वैसे मैं कोई भक्त की Category  में नहीं आती। गर्व भी नहीं हैं इस बात का, हाँ ईश्वरीय शक्ति को अवश्य मानती हूँ। पर मैं कौन होती हूँ यह निर्धारित करने वाली की कौन महान है और कौन नहीं। लाखों लाख लोग भगवान तिरुपति के दर्शन हेतु जाते हैं, फिर मैं कौन ?

एक दिन मैं तिरुपति में थी, कपिलेश्वर, पदमावती, श्रीकलाहस्ति और स्वयं बालाजी के दर्शन करने का सौभाग्य एक ही दिन में मिल गया। मानो मेरा तो तीर्थ ही हो गया।

हर स्थान पर लम्बी – लम्बी कतार, लोगों की भीड़, हर चेहरे पर श्रद्धा। गर्मी का कोई प्रभाव नहीं।

 

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बच्चों को कंधो पर बैठाकर कतारों में लगने से कोई परहेज नहीं। हर उम्र की महिला ने अपने  केश का त्याग करा हुआ परन्तु सब प्रसन्न। अन्न का प्रसाद, लड्डू का प्रसाद, अत्याधुनिक पध्दति से तैयार होकर Conveyer Belt द्वारा आ रहा था। बड़े से बड़ा, छोटे से छोटा हर व्यक्ति भक्ति रस से डूबा हुआ था। उनकी श्रद्धा मेरे दिल के भीतर कुछ झंकृत कर गई। क्या है यह। क्या हम जैसे विवेकी होकर भक्ति करना भूल गए ?

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क्या हमारी पढ़ाई – लिखाई ने हमें अपने संस्कारों से भटका दिया ? क्या भक्ति और विश्वास, Backwardness हैं ? शायद हम भारत के तथाकथित Modern और तथाकथित पढ़े – लिखे लोग त्रिशुंक की तरह हैं जो Decide नहीं कर पा रहे की हमें भक्ति करनी है या नहीं। करनी है तो कितनी और किस तरह की ? मैं धन्यवाद देती हूँ, उन लाखों लाख जनता का जो अभी भी,       भक्ति की डोर को थामें संस्कृति की रक्षा कर रही है। मंदिर में, ईश्वर है, फूल, प्रसाद, तिलक,        घंटा, प्रणाम, सम्पूर्ण समर्पण में अभी भी विश्वास रखे है। कोटि – कोटि धन्यवाद्,  इस जनता का वर्ना हम जैसे तो कब के अंग्रेजों के गुलाम बनकर अपना अस्तित्व ही भुला देते। इन्हीं लाखों, करोड़ों लोगों के कारण हम दो सौ साल मुगलों के और दो सौ साल अंग्रेजों के झेल गए फिर भी

 

हमारी संस्कृति की महक आज भी ताजा है। यही हमारी राष्ट्रिय चिति है। जैसा शायद पंडित दीनदयाल जी  कहते थे। 

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