डॉ. कलाम और डॉ. नागपाल

 डॉ. कलाम  और  डॉ. नागपाल
(30 जुलाई 2015 )

ये  कौम  ही और  थी  ।  नस्ल  ही कुछ और
किस मिट्टी  के  बने थे  ये लोग ???

जो नहीं  जानते  वो सोचेंगे  कि  यह  क्या Comparison  हुआ ?  कहाँ  डॉ. कलाम  और  डॉ. नागपाल ?
लेकिन जितना सोच रही हुँ , उतनी  ही समानता  नजर आ  रही  है। डॉ. कलाम  जब  पूछते –  थे कि उन्हें सबसे  ज्यादा कैसे  याद  किया जाए तो वे  कहते ,\”एक  टीचर  की  हैसीयत  से \” । डॉ.  नागपाल  वो शख्स  थे , जो  By Choice  अध्यापक  बने । I.A.S.  की परीक्षा  में  उत्तीर्ण होने के बाद भी  उन्होंने  अध्यापक होना पसन्द  करा।  उनका  मानना  था  कि  युवा  कच्ची  मिट्टी  के  होते  है, उन्हें  यदि  फौलाद   बनाना  है  जो  देश  के  लिए  कुछ कर  सकें  तो  वो  ताकत  सिर्फ  एक  अध्यापक  में ही होती  है। नीरस विषय को  सरल सुन्दर भाषा  और शैली  में कर , एक कथानक  के रूप  में  प्रस्तुत   करना तो  डॉ. नागपाल की कला  थी।  कहते  है  जो राजनीति  विज्ञान  के छात्र  नहीं  थे  वे भी उनके  व्यख्यान  सुनने  आते थे।  डॉ.  नागपाल आज  तक  \” सर \” के  नाम से ही जाने  जाते है।  वही  उनकी पहचान  थी।

उनका   Trade Mark था  वह सफारी  सूट  जैसा  कलाम  साहब  पहना करते  थे। रंगों  में  हल्का नीला या  स्लेटी , बहुत  हुआ तो हल्का भूरा।  कोई  खिलवाड़  नहीं  बस  सादा लिबास।  बस  चेहरे  का  तेज  और  आँखों  की   बेहिसाब चमक। बच्चों  के साथ  बच्चा  बनकर  चॉकलेट , ice-creams  के लिए  खुश  हो जाना  एक  सरल  ह्रदय  इन्सान  ही कर सकता है।   बच्चो  में दोनों बेहद  लोकप्रिय,  प्रेरित  करने वाली  कहानियाँ  सुनाकर  बच्चो को  उत्साह  से  भर  देना उन्हें  खूब  आता  था।

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कलाम  साहब  की तरह  अपने  subordinates  की  रक्षा   करना , उनका  ध्यान  रखना , डॉ.  नागपाल  की  भी  पहचान थी , मुझे  याद  है , एक  बार , कहीं  बाहर जाना  हुआ , Driver को सोने के लिए कमरा नहीं मिल पाया। Driver ने कहा साहब मैं कार में ही सो जाऊँगा। उसे अपने साथ अपने कमरे में ले आये और पलंग पर सुला लिया।  कहा, तुम्हें कल कार चलानी है, तुम्हें अच्छी नींद आना जरुरी है वहाँ मच्छर और गर्मी में नहीं सो पाओगे।

डॉ.  नागपाल का एक विद्यार्थी Assistant Prof.  पोस्ट पर appoint हुए उनके पास सफर कर जाने और घर तलाशने के पैसे नहीं थे, उस व्यक्ति को अपनी जेब से पैसे दिए और कपडे खरीद कर दिए कि अब तुम्हारे कपडे तुम्हारे ओहदे जैसे होना चाहिए। कौन करता है यह सब ? लगता है कहानियाँ है , पर हमने यह होते देखा है। ऐसी अनेकों दिल को छू लेने वाली, धार्मिक कहानियाँ है । जैसे डॉ. कलाम के किस्से है ।

दो विद्वान, दो चिंतक, दोनों विशाल ह्रदय, दोनों कर्मयोगी आए थे ।  दुनिया में सिर्फ दूसरों को देने। चाहे प्यार, चाहे ज्ञान, चाहे शिक्षा ।और तो और जीवन लीला समाप्त करने का तरीका भी एक जैसा। डॉ. नागपाल हमेशा कहते थे, मैं कर्म क्षेत्र में, अपना प्रिय कर्म यानि भाषण देते हुए जाऊँगा। हम हँसते थे। मानो ईश्वर से वरदान प्राप्त करके आए हों। और सचमुच ऐसा ही हुआ। हिमाचल सोम दिल्ली में India International के कार्यक्रम में तब उच्चायुक्त बन कर जा रहे थे, उनका विदाई कार्यक्रम था। भगवत गीता की प्रसंगिकता विषय पर परिचर्चा थी। हालाँकि डॉ. ओम नागपाल अपना उद्बोधन दे चुके थे। परन्तु दूसरे वक्ताओं के बोलने के बाद उन्हें लगा कि गीता का सार तो उन मुख्य वक्ताओं ने कहा ही नहीं। अतः डॉ. नागपाल ने अपनी कुर्सी पर ही बैठे – बैठे, गीता के अंतिम अध्याय का अंतिम श्लोक पढ़ा, उसका भावार्थ समझाया और चुप हो गए।
सबको लगा उन्होंने बता दिया जो बताना था। परन्तु वे सदा के लिए चुप हो गए थे। गीता का सार समझाते हुए मानो साक्षात् कृष्ण उनकी ऊँगली थामे उन्हें दूसरे लोक में ले गए थे।
एक और बात……जैसे डॉ. कलाम के जाने के बाद उनके सहायक ने खुला पत्र लिखा । वैसे ही डॉ. नागपाल के सहायक upsc में रहे सतीश जी ने एक बेहद मार्मिक पत्र लिखा था । और तो और सतीश जी ने upsc से अपना स्थानांतरण ही करवा लिया । उनका कहना था । डॉ. नागपाल के साथ काम करने के बाद उस कुर्सी पर शायद वे किसी और से नयाय नहीं कर पाएंगे ।

जैसे इन दोनों ने चाहा, वैसा जीवन जिया
जैसे इन दोनों ने चाहा, वैसे ही जीवन से जाना हुआ।
आखिर मिट्टी ने इन जैसे लोग गढने क्यों बंद कर दिए। क्यों यदा – कदा ही ऐसे ,विरले ही सपूत जन्म लेते है।
काश इनका दिया ज्ञान हर माँ, अपने गर्भस्थ शिशु को ही देना शुरू कर दे। शायद कोई और कलाम, कोई और डॉ. नागपाल फिर आ जाए।

Dr.Divya Gupta
www.divyagupta.co.in

Fb/divyaguptaofficial

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