सुदर्शन काका की गोद में ।

02 मार्च की वो शाम मैं कैसे भूल सकती हूँ । जब मेरे पिताजी डाॅ . ओम नागपाल जी के अक्स्मात् देहावसान का फोन आया था । मैं समझ ही नहीं पा रही थी । इन्दौर से दिल्ली का सफर किस तरह बीता शयद एक शून्य की तरह याद है । भावना शून्यता की वो लम्बे अन्तराल की रात थी ।
सुबह दिल्ली पहुँची । अन्तेयष्टि की तैयारी ही थी । पिताजी का पार्थिव शरीर देखकर भी मैं भाव शून्य थी । सब काम कर रही थी । माँ को सम्हाल रही थी । घर के निर्णय ले रही थी । जो रो रहे थे उन्हें समझा रही थी । पर मैं भाव शून्य थी । तभी फोन आया,
\” दिव्या जी, मैं माननीय सरसंघचालक सुदर्शन जी की ओर से बोल रहा हूँ । माननीय सुदर्शनजी सुदूर पंजाब में हैं, वे पहुँच रहे हैं । अन्तेयष्टि कब है, मैंने समय बता दिया । कुछ समय बीता, माननीय सुदर्शनजी पहुँच नहीं पाए थे । फिर फोन आया, माननीय सुदर्शनजी को कुछ कारणवश देर हो रही है, वे जल्द से जल्द पहुँचने की कोषिश कर रहे हैं \”  लेकिन समय बीत रहा था, समय होते अंतिम संस्कार करना आवश्यक  हो रहा था, सो पिताजी को ले जाना पड़ा । मैं अकेली संतान हूँ, इसलिए मैंने अपने बेटे  के साथ पिताजी का अंतिम संस्कार करा । निर्णय मेरे पति का था । मैं, फिर भी भाव शून्य थी ।
किसी को फुसफुसाते सुना, अरे कोई दिव्या को रूलाओ । उसकी चुप्पी ठीक नहीं !
फिर फोन आया, \” दिव्या जी, बस् हम आधे घण्टे में पहुँच जाएँगे । दिल्ली पहुँच गए हैं । माननीय सुदर्शनजी बहुत चिन्तित है और जल्द पहुँच जाएँगे । मैंने जवाब दे दिया कि संस्कार तो, तो हो चुका है, वे सीधे घर आ जाए । \”फिर वही भाव शून्यता ! थोड़ी ही देर में गाड़ियों के रूकने की आवाज आई । माननीय सुदर्शनजी आ गए थे । माँ को प्रणाम करने के बाद, मुझे बुलाया । उन्होंने सर पर हाथ क्या फेरा, कि मैं \” काका…काका \” कहकर

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जो उनके गले लगी कि फिर रोती ही रही । भावनाओं का बांध टूट गया था, पिता तुल्य काका के सर पर हाथ फेरने पर । फिर से लगा कि मैं वही बच्ची हो गई और बचपन में लौट गई हूँ । शायद  देश के लिए माननीय सुदर्शनजी सरसंघचालक थे, परन्तु मेरे लिए \” काका \” पिता के भाई और परिवार के अंतरंग सदस्य । साँसों के हिसाब का फलसफा, उस दिन जो उन्होंने समझाया वो आज दिन तक मेरे स्मरण पटल पर अंकित है ।बहुत देर तक बैठे रहे । कभी मेरा हाथ पकड़ते, कभी सर सहलाते । मुझे कहा, तुम ओम जी का पुत्र हो, उनका नाम और काम दोनों को आगे ले जाना । ओम जी जैसे
विद्वान बहुत कम धरती पर जनम लेते हैं । घाव अभी भरे नहीं थे । पर जीवन पुनः अपनी रफ्तार ले चला था ।

एक दिन एक पोस्टकार्ड मेरे नाम आया । बहुत सधी लेखनी में लिखा हुआ । अब कहाँ कोई पोस्टकार्ड आता है और इतना सुन्दर लिखा हुआ । कथानक देखने के पहले, भेजने वाले का नाम देखा । छोटे से अक्षरों में लिखा था \” तुम्हारा काका, सुदर्शन \” मुझे विश्वास  ही नहीं हुआ । माननीय सुदर्शनजी, अपनी अति व्यस्त देश के लिए समर्पित जीवन में मुझे याद कर रहे हैं । अति स्नेहपूर्ण उदगारों से भरा वो पोस्टकार्ड आज भी मेरी अमूल्य धरोहर है ।
माननीय सुदर्शनजी, मेरे काका कैसे बने ? मेरे बचपन की याद में काका हमारे बराण्डे में दिखाई पड़ते हैं जहाँ उनके और पिताजी के बीच चर्चा घण्टों चलती,
चर्चा कभी-कभी इतनी लम्बी चलती कि रात ढल आती । फिर आग्रह होता कि रात्रि-भोज लेकर ही सुदर्शनकाका जाएँगे । मुझे तो आनन्द ही आ जाता । माँ उस दिन कम डाँटती रहती थी और पापा, काका का प्यार, दुलार मिलता वो अलग । मुझे याद है, जब मैं दोपहर को स्कूल से आती तो, काका आए होते थे । माँ के हाथ का खाना उन्हें बहुत पसन्द था । फिर चलता चर्चा का दौर । मुझे उनके बीच में बैठना बहुत अच्छा लगता था और मैं बैठती भी कहाँ थी ? काका की गोद में । काका घण्टों मुझे अपने पास बैठाए रखते थे । मुझे याद है वे मत्यय आसन में बैठते थे । मुझे उनसे बहुत अच्छी खुशबू आती थी । वे मुझे अनेक ष्लोक सिखाते, कविताएँ सुनाते, वीरों की गाथाएँ सुनाते । मुझे वे काका कम और परम मित्र ज्यादा लगते थे । बाल्य अवस्था का स्नेह आजीवन एक उजास देता है । वही स्नेह बंधन मेरे और काका के बीच था । हाँ, वो मुझे पहाड़े भी याद कराते थे । 12 तक तो ठीक कर लेती थी, पर 13 के पहाड़े पर आकर अटकना षुरू हो जाता था । मुझसे हँसते हुए कहते थे, कि यह लड़की मेरी इन्जीनियरिंग फेल करवा देगी । इसे मैं 13 का पहाड़ा स्मरण नहीं करवा पाया ।

फिर मैंने डाॅक्टरी की पढ़ाई के लिए एम.बी.बी.एस. में प्रवेश लिया । फिर एक पत्र आया। श् यह याद रखना कि डाॅक्टर का जीवन दूसरों के लिए बना है । डाॅक्टर ईश्वर  तुल्य होता है, इसलिए इसका महत्व समझना, समाज और देश के  काम आना । ये स्मरण रखना कि कोई गरीब तुम्हारे इलाज से वंचित न रह जाए । \” वह सबक आज भी अमल करने का प्रयत्न करती हूँ । मेरी पढ़ाई के बीच में ही शदी तय हो गई । पता नहीं काका कहाँ थे, उस समय पर । लेकिन, निष्चित तिथि पर लुधियाना में सम्पन्न होने वाले विवाह में पहुँच गए थे । अनेकों आर्षीवाद और षुभकामनाएँ दी थी, जो आज भी फलीभूत हैं । पिताजी के साथ काका का निरन्तर सम्पर्क बना रहा । विवाह के बाद मेरा जीवन अपनी गृहस्थी में रम गया था । उन दिनों काका से मेरा सम्पर्क समाचार पत्रों के माध्यम से अधिक होता था । पिताजी ने एक पुस्तक लिखी \” सुकरात \” , विमोचन के लिए काका इन्दौर आए थे । विमोचन कार्यक्रम के पष्चात् भोजन घर पर था । मुझे पता था कि काका को जमीन पर बैठकर भोजन करना अतिप्रिय है इसलिए ठेबल हटवाकर सबका भोजन
नीचे पटिये लगाकर परसा गया । भोजन व्यवस्था देखकर उस दिन काका की आँखों में चमक, दुलार, प्रेम और प्रसन्नता देखते ही बन रही थी । बहुत प्रसन्न होकर आषीर्वाद दिए । भोजन के पष्चात् कहा, कि तुम्हारे घर और तुम्हारे हाथ का भोजन कर शयद कुछ दिनों तक पेट भरा रहेगा । वैसे बेटी के घर भोजन ग्रहण करने की प्रथा नहीं है, पर तुम तो बेटी स्वरूप बेटा हो । इसलिए दुगुना आनंद ले रहा हूँ । मुझे गर्व है कि उन्होंने मुझे पहले तो बेटी माना और फिर इतना सक्षम समझा ।

सरसंघचालक बनने के बाद बौद्धिक के लिए उनका इन्दौर आना हुआ । मुझमें इतनी हिम्मत न  थी कि मैं उन्हें सम्पर्क कर आग्रह करती । अब पिताजी नहीं रहे थे । मैं किस चर्चा के लिए उन्हें घर आमंत्रित करती ? बस् इसी उधेड़-बुन में थी, कि संदेश आ गया । श् दिव्या जी, आपको माननीय सुदर्शनजी ने याद करा है और आपको अर्चना कार्यालय बुलाया है मिलने के लिए । \” मुझे सहसा विश्वास  नहीं हुआ । फिर ढेर-सा प्यार और दुलार । मेरे स्त्री रोग विषेशज्ञ होने पर उन्होंने अति प्रसन्नता जताई ।

ज्ञान की पराकाष्ठा देखिए कि उन्होंने प्रसव करवाने के अनके प्रयोगों के बारे में मुझे विस्तृत जानकारी दी । हिन्दू पद्धति, जर्मनी में हो रही षोध, चीन में प्रसव के दौरान होने वाली प्रक्रियाएं इत्यादि । हर विशय पर पकड़ थी काका की और थोथा ज्ञान नहीं, गूढ़ अध्ययन और उसके साथ मौलिक चिन्तन ।
ऐसा ही एक और सुन्दर तथा अनोखा संस्मरण है । अब काका सरसंघचालक के दायित्व से मुुक्त हो गए थे । फिर एक दिन हाल-चाल पूछने के लिए फोन आया । मुझे कहा कि दिल्ली आओ तो मिलने आना, इस फलां तारीख से फलां तारीख तक दिल्ली में हूँ । मैं ऐसा मौका कैसे गंवाती, सो मिलने दिल्ली पहुँच गई । झण्डेवाला पर हम बैठे । खूब चर्चा हुई । दो-तीन घण्टे बीत चले थे । पूर्वाचंल मैं जब उनका प्रवास था, तब उन्होंने बताया कि हर भाश और हर क्षेत्र की अपनी एक रामायण है या रामायण से मिलती-जुलती या उद्धृत एक कथा है, जो लिखी, गाई, सुनाई जाती है । क्यों न ऐसा एक
संकलन तैयार करें, इसके बारे में चर्चा हुई । कई लिपियाँ उन्होंने दिखाई । मन करता था  वो बोलते रहें और मैं सुनती रहूँ । हाँ, आपको जानकार और आष्चर्य होगा कि TV सीरियल \” उतरन \” और ………….. उन्हें बेहद पसन्द था, जिसे वह नियमित देखते थे । माननीय सुरेश सोनी जी मेरी उस लम्बी मुलाकात के साक्षी बने । मेरी वापसी का समय हो चला था । काका मुझे नीचे कार तक छोड़ने आए । सब आष्चर्य कर रहे थे कि माननीय सुदर्शनही किसको छोड़ने गाड़ी तक नीचे आए है । शायद  मैं वो बेटी थी, जिसे उन्होंने भरपूर स्नेह आजीवन दिया । उनका जीवन ही उनकी सीख है, उनका ज्ञान ही उनकी सीख है, उनका प्रेम  ही उनकी सीख है ।

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