हम भीरु हैं, डरपोक हैं !

हम भीरु हैं, डरपोक हैं ! कभी हम भगवान से डर जाते हैं, कभी बन्दों से। कभी हालात से डर जाते हैं तो कभी विपदा से । पर हम इतने डरे, सहमे, हारे से क्यों रहते हैं ?
हम मुसीबतों का सामना डरकर क्यों नहीं कर सकते ?
हम मुश्किलों का सामना, आँखों में आंखें डालकर क्यों नहीं कर सकते ?
हम हर हाल मैं मुस्कुरा कर सीना तान कर, सर उठा कर क्यों नहीं जी सकते ?
हमें सहारों की, बैसाखियों की ज़रूरत क्यों पड़ती हैं ?
हमें कोई तिनका भी चलेगा पर सहारा ज़रूरी हैं ?
भगवान तक तो ठीक था, पर बाबा ? बाबा रे बाबा !!

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अभी यह गुत्थी सुलझानी क्या कम थी कि भगवान् को हमने गढ़ा या ईश्वर नें हमें गढ़ा। हाँ, पर बाबाओं को तो हमने ही बनाया है।
हमनें उनकी शान में कसीदे कढ़े हैं।
हमनें उन्हें उच्चासन पर स्थापित करा है।
हमनें ही उन्हें ईश्वर का साक्षात दूत बनाया है ?
हम ही हमारी कमजोरियों को उनके माध्यम से पूरा करना चाह रहे थे।
शायद हमारी संस्कृति में \’ गुरु \’ का ईश्वर तक पहुंचने का सदमार्ग बताया गया है। क्या इसलिए हमने \’ बाबाओं \’ पर अपनी सारी आस्था उड़ेल दी।
गुरु की महत्ता इतनी बढ़ गई कि हम ईश्वर को भूल उन्हें ही ईश्वर मानने लगे। यह Human behavior है कि यदि आप किसी की प्रशंसा में तीन चार अच्छे वाक्य कह दें तो उन्हें लगने लगता कि सच हैं और हमने तो इन बाबाओं का इतना स्तुति गान करा कि इन्हें भी भ्रम हो गया कि वे इंसान नहीं, भगवान हो गए हैं। ये हमारी ही गलती है।
हमारे देश में ही इतने बाबा क्यों पैदा हो गए ?
कहाँ से पैदा हो गए ? किसने पैदा कर दिए ?

गुरु और बाबा की मानों मशीन लगी हुई है हमारे देश में। एक समाप्त होता है की किसी कोने से दूसरा तैयार होकर बाहर आ जाता है। पहला दूसरे से महान !
धंधा चल रहा है या धंधा बना लिया है ?
वो धूर्त हैं क्योंकि हम मूर्ख हैं।
हम मूर्ख हैं, अनपढ़ हैं, अज्ञानी हैं, मासूम हैं, भोले हैं, क्योंकि हम बाबाओं पर इतनी सरलता से विश्वास कर लेते हैं.
हम समर्पण कर देते हैं, हमारा सर्वस्व उनके हवाले कर देते हैं। यह भूल जाते है कि उनका तमाम ऐश्वर्य हमारे ही योगदान से है।
क्या कोई भी इंसान, आपकी हमारी विपदाओं को कम कर सकता हैं ? मिटा सकता हैं ? हटा सकता हैं ? कदापि नहीं।
कष्टों का आना, समय का चक्र है। कष्ट के आने में कुछ भागीदारी हमारी होती है और कुछ प्रारब्ध का खेल भी होता है।
लेकिन उनसे बचने का कोई short cut नहीं होता है, उसमें से गुजरना \’ ही \’ होता है। कष्ट में से निकलने की सबसे सुचारु कुंजी है ज्ञान।   स्वास्थ्य और परिवार का साथ कष्ट निवारण का मार्ग सुगम बना देता है। फिर \’ बाबा \’ बीच में कहाँ से आ गए ?
ये \’ बाबा \’ हमारा क्या सुधार कर लेंगे ?
और हम हैं कि हम हमारी हाड – माँस की कमाई उन्हें सौंप देते हैं। और वो है कि हमारे कष्टों का धंधा बना लेते है। हमारी कमज़ोरी उनकी ताकत बन जाती है। क्योंकि हम कमजोर है, भीरु हैं, डरपोक हैं।
क्या हम कष्टों का सामना नहीं कर सकते ?
हमें बैसाखियों की, सहारों की ज़रूरत क्यों पड़ती है ?
आखिर कब तक हम इन बाबाओं मे अपना सुख ढूंढेंगे ?
जब तक ज्ञान, स्वास्थ्य और परिवार की महत्ता नहीं समझेंगे तब तक हर रोज़ एक नया बाबा पैदा होगा। संसार का रचियता ईश्वर है, उसकी इस अद्भुत संरचना पर आस्था रखिए। स्वयं पर विश्वास रखिए। अपने पौरुष पर विश्वास रखिए।
फिर ये बाबा पैदा नहीं होंगे। इनका ढोंग पैदा नहीं होगा। ये बाबा न आपका कुछ सुधार पाएंगे और न कुछ बिगाड़ पाएंगे।

 

2 thoughts on “हम भीरु हैं, डरपोक हैं !”

  1. Very very well said madam- u have portrayed it perfectly – wish more and more people will take an inspiration from this!

  2. Karan Singh Pawar

    The rule of law must prevail in any situation. This commitment does not exsist in our Administrative machinery. Corruption is the biggest evil. Unless their is explicit faith in the law of the land. All these situations will always exist.

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