हमारी संस्कृति शर्मसार हुई !

शर्म आनी चाहिए हमें ! हम इतने ओदे लोग है ! हमसे एक हार भी बर्दाश्त नहीं हुई !
शायद हम भूल गए कि यह खेल है ! खेल में जब एक जीतता है तो दुसरे का हारना तय है

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कभी पलड़ा इसका भारी तो कभी उसका
जीत-हार खेल के दो पहलू नहीं बल्कि एक ही हैं !
परसों (२६/०३/२०१५) को सेमी फाइनल के बाद जो भारत मे हुआ वह हमारी संस्कृति तो बिलकुल नहीं है! हमारी संस्कृति शर्मसार हुई ! हम शालीनता भूल गए !हम व्यवहार की परीधि लांध गए ! हम उस स्तर पर गिर गए जहाँ से अपने ही व्यवहार से शर्म आ रही है !
क्या हमें खेल के नीयम नहीं पता क्या ? क्या हम हारना नहीं जानते ? क्या हारना इतना खराब होता है ? क्या हरने वाले अपने नहीं होते ? क्या हारना इतना बड़ा गुनाह होता है ? झाँकिए अपने अंदर और सोचिए की हमनें क्या कर दिया !
और फिर हमने सारा आरोप बेचारी एक लडकी पर डाल दिया ! उसका गुनाह क्या था ? मैच देखने जाना जो हजारों भारतीय भारत से सिर्फ मैच देखने गए थे,
वो पनौती नहीं ,सिर्फ अनुष्का थी ! हमने फिर वही करा, पुरषों ने एक महिला को चुना और अपनी भडास निकाल ली ! किसी ने सोचा भी नहीं की उस पर क्या बीत रही होगी ?
शर्म आनी चाहिए हमें !
जीत को धारण करने का यदि हम उत्साह रखते है तो हार को भी उतने सम्मान के साथ धारण करना आना चाहिए !
धूत क्रीडा में पाण्डव सर्वस्व हार गए थे तब वो खेल नहीं था क्या ? उस \’खेल\’ मे राज – पाट, दौलत, पत्नी और सम्मान सब लुट गया था ! वो खेल था राजनीति थी !
क्या यहाँ ऐसा कुछ दाव पर लगा था ?
हम हारना नहीं जानते और हम हारने वाले को सम्मान की द्रष्टि से नहीं देखते !
क्योंकि जो जीतेगा सिर्फ उसे हम पूजना जानते है, मानो हारने वाले की मेहनत
कुछ भी नहीं ! उसकी तपस्या हम भूल जाते है ! हमें सिर्फ ऊँगलियाँ उठना,
गांलियाँ देना, कटाक्ष करना, मजाक उडाना आता है ! कितना आसान है यह सब अपने घर में बैठ कर करना ! मैदान में उतर कर दिखाए कोई माँ का लाल !
यही हार का भय हम भीतर इतना घुसा देते हैं मानो वो मनुष्य नहीं रेस में दौड़ने वाले घोड़े हों !
क्या हार का भय नहीं जो आज- कल हमारे मासूम स्कूल और कॉलेज के बच्चों को आत्म- हत्या के लिए प्रेरित कर रहा है !
माता-पिता, टीचर हन्टर मार रहे हैं और बच्चा तेज, और तेज रेस में दौडने की कोशिश कर रहा है । फेल हो गया तो कोई गले नहीं लगाएगा । कोई नहीं बोलेगा कोई बात नहीं बेटा यह सब जीवन का अंतिम सत्य नहीं है हार , जीत तो जीवन का अभिन्न अंग है । हम प्यार और संवेदना भूल गए है | जीवन को हर कदम पर हमने रेस बना दिया है कोई दौलत के लिए दौड़ रहा है।
फिर क्रिकेट में हारना देश प्रेम के साथ जोड़ना ठीक नहीं । इतना ही देश प्रेम है तो सरहद पर जाकर
उस जवान के साथ कंधे से कंधा मिलाकर एक साल गुजार कर आएँ । एक हफ्ते में भाग आएगें ।
क्रिकेट देश प्रेम नहीं सिर्फ सटटा है। पैसा है , अपर पैसा ,काला पैसा जो आतंकवाद को जन्म देता है ।
यह हमारी संस्कृति नहीं ।
शर्म आती है अपने आप पर ।
-Dr.Divya Dupta

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