आज गाँधी याद आया…….. !

गाँधी  जयंती पर सबको यकायक गाँधी जी की याद आ जाएगी  ।
गाँधी  प्रासंगिक हो जाएंगे ।
गाँधी  की मूर्ती  सजेगी , माला चढ़ेगी , चर्खा  कतेगा और प्रिय भजन गाये  जाएंगे ।
गाँधी  वापस जिंदा  हो जाएंगे ।
क्या वाकई गाँधी  हमारे बीच है , या महज एक दुकान बनकर रह गए  है।  कौन  कितना गाँधी को जीत है, यह  एक हास्यास्पद विषय है।
गाँधी  एक व्यक्ति है ,  किताबो किस्सों का एक विषय है, भाषणो में एक  example है , ऑफिस में एक तस्वीर है  और अब तो एक ब्रांड है।
पिछले साल Johannesburg जाने का अवसर मिला!
बेहद खूबसूरत शहर !
कल्पना से परे  एक खूबसूरत शहर !  व्यवस्थित और सुरम्य, मुझे दो चीजे निश्चित रूप से देखनी थी – एक क्रिकेट Stadium और गांधी  का tolstoy farm बचपन से किताबो में पढ़ते आ रहे थे, कि गाँधी  Johannesburg ट्रैन से जा  रहे थे, कि  उनके  साथ रंगभेद  का अति व्यवहार हुआ, जिसने उनके मन में   इस रंगभेद  से लड़ने का जज्बा पैदा करा। वहाँ   से आंदोलन का बीज पडा, जो भारत की स्वतंत्रता का कारण बना।  यह था किताबी ज्ञान।
मेरा मन पुलकित था , कि मैं उस आश्रम को अवश्य देखूंगी । जिस होटल में  मैं  रुकीं थी , वह बेहद प्रसिद्ध होटल था । मैंने  वहाँ  से जानकारी चाही की गाँधी जी का tolstoy आश्रम कितनी दूर और कहाँ  है ?  पर  किसी को कोई जानकारी नहीं  थी।  मुझे लगा नौसिखिया है,  बच्चे है , मुर्ख…  इन्हे शायद  पता नही , manager  से पूछती हूँ  – उसे भी  नहीं पता था।  मैंनें अपने Travel agent  से जानकारी चाही- मुझे तो वहाँ जाना ही था, उसने कहा कि वह पता करके बताता है, मेरा कौतुहल  अब चिड़चिड़ाहट में तब्दील हो रहा था , कि  क्या यह लोग इतने मुर्ख हैं,  या Johannesburg के नक्शेपर   गाँधी जी का आश्रम न डालने का षड्यंत्र है  ।  बहुत देर बाद Agent का फोन आया , उसने पता लगा लिया था, उस जगह का Johannesburg  से दो घण्टे  की दुरी पर स्थित  है, वहाँ  कार से जाना होगा।  मैं  खुश हुई, चलो पता तो चला अब जाना संभव होगा, सबको कार में  बैठा कर हम  सब उस स्थान और चल पढ़े मन में  इतिहास महसूस करने की जिद्द थी। उस क्षण को महसूस करने की उत्सुकता थी। हम  लगभग दो घण्टे  सफर तय कर , उस तथाकथित गाँव  में  पहुँचे,  जो हमारे किसी भी शहर से अच्छा था, फिर पूछा तीन चार लोगो से पूछने के बाद एक भले आदमी ने उंगली  उठाकर दूर पहाड़ी के पास का इशारा करा।  हम उस तरफ चल पड़े  ।  अरे…!  परन्तु ये तो कच्ची सी सड़क थी, मानो रास्ता कुछ दास्तान  कह रहा हो। सबने मुझसे  पूछा हम जा कहाँ रहे है,  कुछ समझ नहीं आ रहा था,  चल क्या रहा है,  कच्ची सड़क पर हम काफी दूर आ गए थे – कोई बंन्दा नहीं , कोई अहाता  नही, कोई पेड़ नहीं , कोई  दूर-दूर तक घर -मकान, दुकान  नहीं ।  धूल उड़ाता हुआ, एक पुरानी सी फटफटी  पर कोई आता दिखा, उसको  रोक के पूछा -उसने हमें ऐसा देखा मानो हम एक अजायबघर के प्राणी  हो – फिर उसने ऊँगली उठा  दी।  हम फिर आगे चल पढ़े -अरे वाह , आगे एक पहाड़ी दिखाई दी- उस पर बड़े -बड़े अक्षरो  में   लिखा था – गाँधी !!!!
शायद हम  Tolstoy farm पहुँच गए थे।

\"gandhi_farm\"

पर यह क्या था – बंजर ज़मीन  मेरे सामने थी- खाली ,सुनसान वहाँ कुछ नहीं था।
कुछ नहीं, कोई घर नहीं, झोपड़ी  नहीं, आश्रम नहीं।
बस एक पत्थर जिस पर गाँधी Tolstoy farm का  ज़िक्र था।
बस !! क्या यह था, वह महान Tolstoy farm जहाँ से गाँधीजी ने अपना स्वाधीनता आन्दोलन शुरू करा था ?
क्या इस बंजर ज़मीन  के बारे में हम बचपन से पड़ते आ रहे थे ?
क्या हमारे दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले राजनायिक यहाँ कभी नहीं आये थे ?
क्या किसी ने इस ज़मीन  की कभी सुध नही ली थी ?
क्या यह सच तमाम गाँधीवादी जानते थे ?
क्या यह जानते थे , कि Tolstoy farm के नाम पर सिर्फ दो ईंटे हैं और बंजर जमीन है ?
यदि यह जानते थे , तो सारे गाँधीवादी  ढोंगी  और पापी है –
यह, यह नहीं जानते तो भी तमाम गाँधीवादी कहा ढोंगी , महाढोंगी और पापी है।
मेरा मन क्षोभ से भर गया।
देखा जाये तो अहमदाबाद के आश्रम में क्या है – चार कुटिया , एक चर्खा , एक खड़ाव और एक छोटा सा संग्रहालय  ?
क्या यहाँ ऐसा कोई स्मारक भारत सरकार , उसके राजनयिक और गाँधी के नाम पर सरकार से , हर वर्ष करोड़ों डकार जाने वाले गाँधी वादियों को कुछ बनाना नहीं चाहिए था ?
मुझे बेहद गुस्स्सा आ रहा था।  मैं गुस्सा कर रही थी ,  बोल रही थी पर सुनने वाला वहाँ – सन्नाटे के सिवा , कोई न था।
जी हाँ.… गाँधी बस महज़  एक दुकान है, Brand  है , उसके अलावा और कुछ नही।
धिक्कार है हम पर।
खादी पहनने से गाँधीवादी दिखना ज्यादा जरूरी है। वो  Branding है , हमारी
किताब का गाँधी, तस्वीर  का गाँधी, अब हम भुला चुके है।
हमें बस नोट दिखाइ  देता है  – और कुछ नहीं, हम वाकई उनके बन्दर की तरह हो गए है !!!
अंधे …… , बहरे …… और  गूंगे …… !!!!!

डॉ दिव्या गुप्ता
www.divyagupta.co.in
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