राजनीति, नेतृत्व और साधना
(21 Aug 2015)
वर्तमान दौर में \’राजनीति\’ शब्द बहुत कॉमन-सा हो गया है । चाय-पान की दुकानों से लेकर ससंद के गलियारों तक में चर्चाएं राजनीति पर अक्सर होती रहती है । चाय की चुस्कियों से राजनीति पर शुरुआत करने वाले लोग हर चीज में राजनीति तलाशते रहते हैं, जबकि ऐसा है नहीं । इसका अनुभव पिछले दिनों महेश्वर (खरगोन) में आयोजित नेतृत्व साधना की तीन दिवसीय कार्यशाला के शिविर में हुआ । माँ के नर्मदा तट पर महेश्वर रिट्रीट पर आयोजित इस बौद्धिक अनुष्ठान का आयोजन रामभाऊ म्हालगी प्रबोधिनी, मुंबई ने किया था । शिविर में मध्यप्रदेश के अलावा राजस्थान, बिहार, केरल, छत्तीसगढ़, दिल्ली, कर्नाटक, गुजरात, झारखण्ड, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, आन्ध्रप्रदेश आदि प्रान्तों से करीब 50 युवा शामिल हुए थे, जो कार्पोरेट से लेकर डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, चार्टर्ड अकाउण्टेन्ट,फैशन डिजाइनर, ज्वेलर्स आदि क्षेत्रों से थे । सभी हाईली क्वालिफाइड और उनकी औसत आयु 35 वर्ष थी । तीन दिनों में भाषण कला, चुनाव प्रबंधन, सरकार मे NGO की भूमिका, संविधान, सूचना का अधिकार, नक्सलवाद, व्यक्तित्व विकास, चुनाव सुधार आदि विषयों पर 14 से अधिक विषय विशेषज्ञों के लेक्चर्स हुए । सभी ने पावर प्वाइंट प्रजेन्टेशन से अपनी बात कहीं।
कार्यक्रम में मध्यप्रदेश के संस्कृति व पर्यटन राज्यमंत्री श्री सुरेन्द्र पटवा, मध्यप्रदेश विधानसभा अध्यक्ष डाॅ. सीताशरण शर्मा और रामभाऊ म्हालगी प्रबोधिनी, मुंबई के उपाध्यक्ष श्री रवीन्द्र साठे अतिथि वक्ता बतौर उपस्थित हुए । समापन समारोह के पहले मौक पार्लियामेन्ट का आयोजन किया गया, जो सबसे अधिक रोचक और यादगार रहा ।
मौक पार्लियामेन्ट में एक डमी संसद होती है जिसमें विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के सांसद होते है और वे शपथ से लेकर सवाल जवाब भी करते है । पूरक प्रश्न भी होते है और वह सब शोर-गुल व हंगामा होता है जो हम प्रायः संसद के सत्र में देखते है । सत्ता पक्ष पर विपक्ष आरोप लगाता है और स्पीकर बार-बार सांसदों को बैठने के लिए कहता है । अंत में प्रधानमंत्री का भी सम्बोधन होता है ।
इस आयोजन में श्री रवीन्द्र साठे ने बहुत अच्छी बात कही । उन्होंने कहा कि राजनीति विकासोंन्मुखी होना चाहिए । मतलब जो जनप्रतिनिधि अपने कार्यकाल में सशक्त विकास कार्य करता है उसे अलग से राजनीति करने की आवश्यकता नहीं । डाॅ. सीताशरण शर्मा का कहना था – कुछ लोगों ने राजनीति को मजाक बना कर रख दिया है जबकि राजनीति – नीति और विचारों का संघ है । श्री पटवा के अनुसार समाज के अंतिम व्यक्ति का कल्याण करना ही \’राजनीति\’ है ।
अगर हम उच्च शिक्षा में पढ़ाई जाने वाली पाठ्य पुस्तकों के आधार पर राजनीति पर गौर करे तो पता चलेगा कि यूनान के एंथेस नगर में दो हजार वर्ष पूर्व विचारक सुकरात ने जो चिंतन शुरू किया वह प्लेटो, अरस्तू, मेकियावली से होता हुआ आज यहां पहुंचा । भारतीय दर्शन के अनुसार – महाभारत काल में राजनीति पर खूब चर्चा हुई । राजनीति विज्ञान को राजधर्म कहा गया । कौटिल्य ने राजनीति को दण्डनीति कहा और अर्थशास्त्र नाम से राजनीति पर एक महत्वपूर्ण रचना की । चीन में कन्फ्यूशियस ने राजनीति को गंभीरता से लिया । मध्ययुग में हाब्स, लॉक, रूसो, मान्टेस्क्यू, बोंदा आदि ने अपने-अपने ढंग से राजनीति को परिभाषित किया । लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, पंडित मदनमोहन मालवीय, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, डाॅ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे महापुरूषों ने सेवा और जनजागरणों को राजनीति के रूप में प्रतिष्ठित किया ।
विचारक विनय सहस्त्रबुद्धे कहते है – समाज के उपेक्षित वर्ग के लिए कुछ करना भी राजनीति है । प्रतिभावानों को अनुकूल वातावरण मिलें ताकि वे अपने लक्ष्य को हासिल कर सके।
Dr. Divya gupta
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